Friday, May 6, 2011

मुस्ताङ जाने सडक



चन्द्रशेखर कार्की- यो सडकबाट कालिगण्डकी नदी किनार हुँदै माथिल्लो मुस्ताङ लोमाङथाङ पुगिन्छ। सदरमुकाम जोमसोमबाट लोमाङथाङ ८३ किलोमिटर टाढा छ। दुई वर्षअघि सञ्चालनमा आएको जोमसोम-लोमाङथाङ सडकबाट ९ घण्टामा माथिल्लो मुस्ताङ पुग्न सकिन्छ।

अपने खाली समय में : फदील अल-अज्ज़वी








  
 
अपने लम्बे और उबाऊ खाली समय के दौरान 
मैं पृथ्वी के गोले से खेलने बैठ जाता हूँ.
मैं कुछ मुल्क बनाता हूँ बगैर पुलिस या किसी गुट के 
और कुछ को निकाल देता हूँ जो अब उपभोक्ताओं को आकर्षित नहीं करते.
बंजर रेगिस्तानों से मैं गुजार देता हूँ कल-कल बहती नदियाँ 
और बनाता हूँ कुछ महाद्वीप और समुद्र 
जिसे बचा कर रख लेता हूँ भविष्य के लिए कि क्या पता.   

Lifestyle changes pushing up metabolic syndrome: study

Vijay Viswanathan, MD, M.V.Hospital for Diabetes (left), at a press conference in Chennai on Thursday. J.Nagarathinam, chief executive of the hospital is in the picture. Photo: S.R.Raghunathan
Vijay Viswanathan, MD, M.V.Hospital for Diabetes (left), at a press conference in Chennai on Thursday. J.Nagarathinam, chief executive of the hospital is in the picture. Photo: S.R.Raghunathan
 Special Correspondent of the Hindu
 Urban lifestyles, wrong diet and sedentary habits are pushing up the prevalence of metabolic syndrome in the city, according to a study.

Thursday, May 5, 2011

ओरहान पामुक : टेलीविजन मुझे सिर्फ गुस्सा ही दिलाता है

( 1952 में इस्ताम्बुल में जन्में ओरहान पामुक तुर्की के प्रसिद्द उपन्यासकार हैं. उनके उपन्यासों का दुनिया की पचास से भी अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. माई नेम इ
ज 
रेड, स्नो, व्हाईट कैसेल, म्यूजियम आफ इनोसेंस जैसे उपन्यासों के लेखक पामुक को 2006 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. यहाँ प्रस्तुत है उनके गद्य की एक छोटी सी बानगी, उनके कथेतर गद्य संग्रह ' अदर कलर्स ' से - Padhte Padhte ) 
शाम को थक कर चूर 
मैं शामों को थक कर चूर घर लौटता हूँ. सीधे सामने की तरफ सड़कों और फुटपाथों को देखते हुए. किसी चीज से नाराज, आहत, कुपित. हालांकि मेरी कल्पना शक्ति सुन्दर दृश्यों से आकर्षित होती रहती है लेकिन ये मेरे दिमाग की फिल्म में तेजी से गुजर जाते हैं. समय बीत जाता है. कोई फर्क नहीं. रात घिर आई है. बदकिस्मती और हार. रात के खाने में क्या है ? 

मेज पर रखा लैम्प जल रहा है ; बगल में ही सलाद और ब्रेड का कटोरा रखा है, सबकुछ उसी टोकरी में ; मेजपोश चारखानेदार है. और कुछ ? ...... एक प्लेट और बीन्स. मैं बीन्स की कल्पना करता हूँ लेकिन यह काफी नहीं है. मेज पर वही लैम्प अब भी जल रहा है. थोड़ा सा दही शायद ? या शायद थोड़ी सी ज़िंदगी ? 

आखिरी ख्वाहिश और वसीयत

Why and how I became fan of the Hikmat's poem, I cannot express. When I met his poem in Kalam magazine, first time, then I started to read him where I get. this poem I courtesy from the http://padhte-padhte.blogspot.com.

आखिरी ख्वाहिश और वसीयत : नाजिम हिकमत

कामरेडों, अगर ज़िंदा न बचा मैं वह दिन देखने के लिए 
-- मतलब अगर मर गया मैं आजादी मिलने के पहले ही -- 
मुझे ले जाना  
और दफना देना अन्टोलिया गाँव के कब्रिस्तान में.

love poems


I chose these 5 love poems for you which are composed by the top most famous poets in the World. I got these poems in the http://padhte-padhte.blogspot.com which are translated by Manoj Patel.

poem of Karl Marx

First time I had read this poem in Nepali language. I think, the poem was translated by Krishna Sen Ichchhuk. After then, I read his other poems, too. And, after so long time, I got chance to read this poem in facebook which was posted by Sushila Puri, India.
---- कार्ल मार्क्स
 कठिनाइयों से रीता जीवन
मेरे लिए नहीं,
नहीं, मेरे तूफानी मन को यह स्वीकार नहीं
मुझे तो चाहिए एक महान ऊँचा लक्ष्य
और, उसके लिए उम्रभर संघर्षों का अटूट क्रम
...ओ कला ! तू खोल
मानवता की धरोहर, अपने अमूल्य कोषों के द्वार
मेरे लिए खोल !
अपनी प्रज्ञा और संवेगों के आलिंगन में
अखिल विश्व को बाँध लूँगा मैं !''